माना जाता है कि भारतीय विन्ध्य पर्वत के दक्षिण दिशा के भूगोल से परिचित नहीं थे.
श्रीमद् भागवत के इस श्लोक को देखिये.
"चन्द्रवसा ताम्रपर्णी अवरिदा कृतमाला
वैहावसी,कावेरी,वेषी,पयस्विनि,शर्करावती
तुंगभद्रा,कृष्णा,वैण्या,भीरूरथी,गोदावरी
निर्विंध्या,पयोष्वी,तापी,रेवा,सुरसा,नर्मदा
चर्मण्यवती,सिन्धुरन्ध्रःशोणश्च नदौ,महानदी
वेदस्मृति,ऋषितुल्या,त्रिसमिधा,कौशिकी
मन्दाकिनी,यमुना,सरस्वती,द्रष्द्वती,गौतमी
सरयू,रोधस्वी,सप्तवती,सुषोणा,शत्चन्द्र-भागा,मरूधा,वितस्ताअसिद्री,विश्वेति महानद्यः (श्रीमद् भागवत ५/१९/१८)
लगभग ४४नदियों की सूची है जिसमें उत्तर दक्षिण की नदियाँ शामिल है.
भगवान कृष्ण के भाई बलदेवजी की तीर्थ
यात्रा के वर्णन में सारे भूगोल का वर्णन है
आर्या द्वैपायनी दृष्ट्वा शूर्णरकमानाद बलः
तापीं पयोष्णी निर्विन्ध्यामुखपस्पृष्यात्म
दण्डकम (श्रीमद् भागवत १०/७९/२०)
पुराणों में भारत भूमि के सभी पर्वतों,नदी,तालाब,ग्राम,नगर और भौगोलिक रचनाओं का नामकरण और
विशद भौगोलिक वर्णन मिलता है.
हमारे राजगढ़ जिले की निर्विन्ध़्या(नेवज)
का वर्णन दृष्टव्य है.श्रीमद् भागवत में नेवज
नदी का वर्णन कई बार आया है.बताते हैं कि नेवज के किनारे पर महर्षि अत्रि का आश्रम गुरूकुल विद्यमान था.
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एस.के.शर्मा,रिटा.प्राचार्य,२,माता मन्दिर के
पास,शहीद कॉलोनी,ब्यावरा(राजगढ.)मप्र
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Thursday, 26 February 2015
प्राचीन भारतीयों का भूगोल
Wednesday, 25 February 2015
अजनार की यात्रा
अजनार का प्रारम्भ आंदलहेड़ा के तालाब से होता है जो आगर-आगरी,मलावर होते हुए एक छोटे नाले में बदलने लगती है.बूड़ाखेड़ा और अंगदपुर में पानी बड़ने
लगता है.बारवाँ,लसूड्ल्याऔर डाब्रया में
हरियाली और प्राकृतिक सुषमा में वृद्धि
होने लगती है.भूरा से बहादुरपुरा के बाद
एक छोटी नदी का रूप धर लेती है.यहाँ
नदी के दोनों किनारों पर हरी घास की
चादर सुन्दरता में वृद्धि करने लगती है
आसपास बड़े वृक्ष,पक्षियों का कलरव
और धूप की आँखमिचौली इसके सौन्दर्य
को अप्रतिम कर देते हैं.ब्यावरा में प्रवेश
के साथ ही अजनार एक नदी का रूप
लेती है.श्रीअंजनीलालधाम के पास तो
प्राकृतिक सुषमा देखते ही बनती है.प्राचीन
वृक्ष और सुन्दर घाट की सीड़ियाँ नदी को
गरिमा प्रदान करते हैं.द्वादशज्योतिर्लिंग के
पीछे नदी का उल्लास देखते ही बनता है.मानो नदी यहाँ जीवन्त हो उठती है.एक
कुण्ड में प्रवेश कर गौमुख से निःसृत हो
कर अजनार किल्लेवाले घाट पर पहुँच कर भगवान रामेश्वर का दर्शन कर तृप्त
हो जाती है.दोनों पुलों को पार कर छोटी
धाराओं मे बटकर मन्थर गति से एक मोड़
के बाद नदी रामलला के प्राचीन घाट पर
पहुँच जाती है.धीरे-धीरे फिर एक पुल पार
कर अन्तिम घाट पर बिछड़े हुए स्वजनों
के अवशेषों को अपने अंक में समेट कर
नदी ब्यावरा से विदा लेकर नयापुरा,पड्या
सुल्तानपुरा को पारकर दांगीपुरा पहुँच
जाती है.अब राजस्थान के मनोहरधाना
में नेवज और घोड़ापछाड़ से महासंगम
कर यह बड़े नद में बदल जाती है.आस
पास के खेतों को सींचती अनगिनत जीवों
की प्यास बुझाती चलती है.तीन धारा में सात नदियों का संगम मरूप्रदेश की युगों
की प्यास बुझाती हुई सागर में लीन होने
की आकांक्षा से तेजी से दौड़ने लगती है.चम्बल नदी के रूप में राजस्थान के दक्षिण पूर्व में बहती हुई अन्त में उ.प्र.के जालौन जिले में यह यमुना नदी में संगम करती है.जो प्रयागराज में पवित्र गंगा में संगम कर गंगा बन जाती है.चम्बल के जल की विशेषता है इसकी निर्मलता.
बीच-बीच में छोटे-बड़े गाँव,शहर नदी को
मैली करने की होड़ करने लगते हैं.किन्तु
प्रकृति ने नदी को स्वयं स्वच्छ होने का
वरदान दिया है.यह है सेप्रोबियन सिस्टम
तीन किलो मीटर तक बहने से वायु,सूर्य,
मिट्टी,जीवजन्तु और सूक्ष्म जीवाणु इसे
फिर स्वच्छ कर देते हैं.हमें इस प्रवाह को
सतत बनाये रखना होगा.युगों से हमारे
पूर्वज नदियों से अमृततुल्य नीर और स्नेह
प्राप्त करते रहे हैं.इनके किनारों पर निवीढ़
शान्ति,पवित्रता और आनन्द प्राप्त करते
रहे हैं.देव अर्चन,पूजन,तर्पण औरआवाहन
कर आह्लाद प्राप्त करते रहे हैं.हमें भी
अपनी कृतज्ञता ज्ञापन करते हुए इन्हें स्वच्छ रखने और संरक्षण करना है.खुशी
की बात तो यह है कि आज ब्यावरा के सभी नागरिक,अंजनीलाल समीति,स्वयं
सेवी संस्थाएं,प्रशासन और संगठन इस
पवित्र कार्य में एकजुट होकर प्रयत्नशील
हैं.हम निश्चित ही आनेवाली पीड़ी को एक
सुन्दर और गरिमामय जल स्त्रोत सौंपकर
जाएंगे.
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श्रीगौरीशंकर नामदेव के सहयोग से
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एस.के.शर्मा,रिटा.प्राचार्य,२,माता मन्दिर के
पास,शहीद कालोनी ,ब्यावरा.
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Monday, 23 February 2015
अक्षपाद गौतमऋषि परम्पराकेब्राम्हण
राजस्थान के तीर्थराज पुष्कर में भगवान ब्रम्हा का प्रसिद्ध मन्दिर है.यह क्षैत्र मुख्य रूप से गुर्जर गौड़ ब्राम्हण समाज के लिये अत्यन्त पवित्र माना जाता है.प्राचीन गुर्जर प्रदेश में स्थित यह तीर्थ यहाँ के एक राजा गुर्जरकर्ण से सम्बन्ध रखता है.उनके लिये पुत्रेष्टि यज्ञ कराने वाले ऋषि अक्षपाद गौतम थे.इन्हीं गौतम ऋषि ने यज्ञ के द्वारा पुत्र की प्राप्ति राजा के कराई थी.
जमदग्नि भरद्वाजो विश्वामित्राणि गौतमः
वशिष्ट काश्यपायागत्या मुनयोगौत्र कारिणि (बौधायकल्प)
उक्त यज्ञ में १५६ शिष्य थे ८४यज्ञ करने बैठे तथा ७२ छोड़ (यज्ञ व्यवस्थामे)
गौतम ऋषि के शिष्य-वत्स,कौशिक,गौतम
शांडिल्य,भर्ग,मुद्गल,कश्यप,भारद्वाज,वशिष्टभृगु,पाराशर ये १२ थे.ऋषि गौतम की स्मृति में "गौतम तीर्थ" देवलिया जिला प्रतापगढ़ राजस्थान मेम स्थित है.राजा ने १५६ शिष्यों को १५६ ग्राम दिये,इन ग्रामों के नाम से कुलगौत्र 'आवंटक' हुए.गौड़ देश के ऋषि के कारण गौड़ और गुर्जर प्रान्त के होने से गुर्जर गौड़.(गौंडवाना के ब्राम्हण )इस प्रकार हम आमल्या ग्राम के जोशी थे अतः आमल्याजोशी कहलाये.
श्रीमद्भागवत के दशम स्कन्ध के ४५ वें
अध्याय का ३१ वाँ श्लोक(१०/४५/३१)
अथो गुरूकुले वासमिच्छन्तानुषजग्मतुः
काश्यपं सान्दीपनिं नाम ह्यवन्तीपुरवसिनम
भगवान श्रीकृष्ण,उज्जयिनी निवासी कश्यप गौत्रोत्पन्न सांदीपनि के आश्रम में
विद्या अध्ययन के लिये गये.
इस प्रकार हम कश्यप गौत्र के ब्राम्हण हैं.
हमारे पूर्वज लगभग ६०० वर्षपूर्व नरसिंह
गढ़ स्टेट के सारंगपुर के ग्राम नारायण्या
सुल्तान्या में आये थे.आज भी हमारे गौत्र
के लोग वहाँ रहते हैं.वहीं पर एक श्रुति के
अनुसार पूर्वज को खेती करते समय एक
सोने का पात्र मिला,जिसकी सूचना पर राजा ने उन्हें बुलाया.खेत के एक पत्थर को रखकर उन्होंने सकुशल लौटने पर भैरूँ मानकर पूजन की.वर्तमान में धाकड़
समाज ने दो चबूतरे बनाकर छोटेपर हमारे
भैरव की स्थापना की.जहाँ मैं सपरिवार
पूजन कर चुका हूँ.
********श्री गौतमाय नमः**********