Saturday, 4 April 2015

डॉ.राधा वल्लभ त्रिपाठी का सम्मान

* भारत के महामहिम राष्ट्रपतिजी से सम्मानित *                                                                            
         डॉ.राधा वल्लभ त्रिपाठी
राजगढ़ ही नहीं यह म.प्र.के लिए
भी गौरवान्वित होने का मौका था
जब डॉ.त्रिपाठी का सम्मान,दि.
२१/३/१५ को राष्ट्रपति महो.द्वारा
किया गया | "निपुणता तथा शास्त्र
में पांडित्य के लिए यह प्रमाणपत्र
प्रदान करता हूँ "- महामहिम
डॉ.त्रिपाठी का जन्म राजगढ़ में
डॉ.गोकुल प्रसाद त्रिपाठी के यहाँ
दि.१५/२/४९ को हुआ था |
एम.ए.,पी.एच.डी.,डी.लिट की
  उपाधि श्रेष्ठता से प्राप्त कर वे
  डॉ.हरि सिंह गौर वि.वि.सागर में
  अध्यापन करते हुए विभागाध्यक्ष
  अधिष्ठाता, और कार्य.कुलपति
  जैसे पदों को सुशोभित किया |
  भारतीय दूतावास, बेंकाक में
   सलाहकार जैसे प्रतिष्ठित पद
   पर रहे | सिल्पाकार्न वि.वि. में
    अतिथि व्याख्यान देकर माँ
   भारती का मान बड़ाया |लाल
    बहादुर शास्त्री वि.वि.में कुलपति
    पद पर कार्य किया |
    एशियाटिक सोसा. बॉम्बे से स्वर्ण
    अखिल भारतीय प्राच्य विद्या
    पुरस्कार, कालिदास पुर., भोज
    पुरस्कार, के.के.बिड़ला फाउ.
    का शंकर पुर. हिन्दी साहित्य
    सम्मेलन का 'महामहोपाध्याय'
     अलंकरण, भवभूति पुरस्कार |
    संस्कृत, हिन्दी में १५९ ग्रन्थों का
    लेखन व प्रकाशन| २१६ शोध
    ग्रन्थों का निर्देशन किया |
    सागरिका, नाट्यम, और दूर्वा
    पत्रिकाओं का वर्षों संपादन |
    विदेशों में गंभीर विषयों पर
    विद्वत्तापूर्ण, गरिमामय व्याख्यान
    देकर सम्मान अर्जित किया |
    चालीस से अधिक व्याख्यान
    कोलम्बिया, नेपाल, भूटान,
    जर्मनी,
    वियेना, जापान, बेंकाक,
     लाइपाजिन
    आदि देशों में दे कर भारत का
    मान बड़ाया| विश्व संस्कृत
    सम्मेलन की अध्यक्षता की |
    देश विदेश में अपनी विद्वत्ता
    से जाने जाने वाले त्रिपाठीजी
    सादगी, सरलता और विनम्र
    व्यवहार के लिये अनुकरणीय
     हैं| प्रतिष्ठित विद्वान ब्यावरा
     के विश्व प्रेम मन्दिर में अपने
     व्याख्यान भी उतनी ही सरलता
     से देते हैं जितनी विद्वत्ता से
     किसी गंभीर विचार विमर्श में         
     क्षेत्रों में विख्यात है| नरसिंहगढ़
     के 'भारती-भवन' मेंआपका
     परिवार सुव्यवस्थित है| राजगढ़
     में डॉ.त्रिपाठी चिकित्सा क्षैत्र
     में जाने जाते हैं| आपकी पत्नि
     डॉ.सत्यवती, ब्यावरा के स्वनाम
     धन्य शिवदत्त भारद्वाज की पुत्री
      हैं | आपकी ज्येष्ट पुत्री लंदन
      में चिकित्सक, एक पुत्री
      अमेरिका में आर्कीटेक्ट पद पर
      कार्यरत हैं छोटी पुत्री गायन के
      क्षैत्र में एक स्थापित व्यक्तित्व
       है |
      हम राजगढ़ और ब्यावरा के
      नागरिकगण डॉ.त्रिपाठी के
      सम्मान से गौर्वान्वित अनुभव
      करते हैं एवं उनके सुखद भावी
      जीवन की कामना करते हैं |
       ~~~~इति वृत्तम्~~~~~

   एस. के. शर्मा ,रिटा.प्राचार्य,२माता मंदिर
    के पास .ब्यावरा (राजगढ़) म.प्र.
   

Saturday, 14 March 2015

कचरे का पहाड़ -भारत का एक अजूबा

भारत की राजधानी दिल्ली जहाँ लालकिला,कुतुबमीनार,जंतर-मंतर और कई विराट और सुन्दर ईमारतों के लिये प्रसिद्ध है. वहीं एक खास बात के लिये भी प्रसिद्ध है वह है कचरे क पहाड़.

गाजीपुर में हम जैसे ही प्रवेश करते हैं, कचरे का एक बड़ा पहाड़ दिखाई दैता है.यह वास्तव में दिल्ली वासियों द्वारा फेंके गये ढेर सारे कचरे, गंदी वस्तुएं, टूटे-फूटे सामान और कूटा कचरा, कूड़ा, मकान से निकले तमाम कार्बनिक और अकार्बनिक वेस्ट का मिलाजुला सामग्री का बड़ा पहाड़ बन गया है. दूर से देखने पर यह अंदाजा लगाना मुश्किल है कि यह कूड़ा और गंदगी का बना होगा. लेकिन इस पर मंडराते अनगिनत चील,गिद्ध ,कौए और अन्य मुर्दाखोर पक्षी और इस क्षैत्र के वातावरण में फैली दुर्गंध से शिघ्र ही समझ में आजाता है कि यह मात्र कूड़े का पहाड़ ही है.यह लगभग एक किलोमीटर के एरिया में फैला है.जो दूर-दूर से दिखाई देता है.लेकिन दिल्ली के लोग बड़े चतुर हैं.इस पहाड़ को अब एक सुन्दर और रम्य स्थान में बदला जा रहा है.एक हरियाली से भरी पहाड़ी जो कुछ ही वर्षों में हरीभरी और पिकनिक स्पॉट में बदल जाएगी.लगभग एक चौथाई स्थान के आधार पर सुन्दर घास उगाकर मनोहारी स्थान में बदला जाचुका है जहाँ की शोभा देखते ही बनती है.वह दिन दूर नहीं जब यहाँ लोग अपने व्यस्त जीवन से त्रस्त होकर कुछ समय के लिये अपनी थकान मिटाने और मनोरंजन के लिये आना प्रारम्भ कर देंगे.तब यह स्थान जो गंदगी और अभिशाप के रूप में प्रसिद्ध था एक खूबसूरत मनोरंजक जगह के रूप में प्रसिद्ध हो जावेगा.साथ ही देश,विदेश में गंदगी  से निबटान और भूमि के चक्रीकरण का एक नायाब उदाहरण बन कर उभरेगा.जिससे अन्ततः लोगों का गन्दगी और कूड़े के प्रति नजरिया बदलेगा और जनता में ट्रेचिंग ग्राउण्ड के लिये भूमि देने के प्रति आक्रोश में कमी आयेगी.मनुष्य के जीवन में निकृष्ट के लिये भी मोह उत्पन्न होगा और धारणा में बदलाव होगा.भारतीयों के मानस में इस कहावत की पुष्टि होगी "बीस वर्ष में कूड़े के भाग्य भी बदल जाते हैं" जय स्वच्छभारत .

Thursday, 26 February 2015

प्राचीन भारतीयों का भूगोल

माना जाता है कि भारतीय विन्ध्य पर्वत के दक्षिण दिशा के भूगोल से परिचित नहीं थे.
श्रीमद् भागवत के इस श्लोक को देखिये.
"चन्द्रवसा ताम्रपर्णी अवरिदा कृतमाला
वैहावसी,कावेरी,वेषी,पयस्विनि,शर्करावती
तुंगभद्रा,कृष्णा,वैण्या,भीरूरथी,गोदावरी
निर्विंध्या,पयोष्वी,तापी,रेवा,सुरसा,नर्मदा
चर्मण्यवती,सिन्धुरन्ध्रःशोणश्च नदौ,महानदी
वेदस्मृति,ऋषितुल्या,त्रिसमिधा,कौशिकी
मन्दाकिनी,यमुना,सरस्वती,द्रष्द्वती,गौतमी
सरयू,रोधस्वी,सप्तवती,सुषोणा,शत्चन्द्र-भागा,मरूधा,वितस्ताअसिद्री,विश्वेति महानद्यः (श्रीमद् भागवत ५/१९/१८)
लगभग ४४नदियों की सूची है जिसमें उत्तर दक्षिण की नदियाँ शामिल है.
भगवान कृष्ण के भाई बलदेवजी की तीर्थ
यात्रा के वर्णन में सारे भूगोल का वर्णन है
आर्या द्वैपायनी दृष्ट्वा शूर्णरकमानाद बलः
तापीं पयोष्णी निर्विन्ध्यामुखपस्पृष्यात्म
दण्डकम (श्रीमद् भागवत १०/७९/२०)
पुराणों में भारत भूमि के सभी पर्वतों,नदी,तालाब,ग्राम,नगर और भौगोलिक रचनाओं का नामकरण और
विशद भौगोलिक वर्णन मिलता है.
हमारे राजगढ़ जिले की निर्विन्ध़्या(नेवज)
का वर्णन दृष्टव्य है.श्रीमद् भागवत में नेवज
नदी का वर्णन कई बार आया है.बताते हैं कि नेवज के किनारे पर महर्षि अत्रि का आश्रम गुरूकुल विद्यमान था.
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एस.के.शर्मा,रिटा.प्राचार्य,२,माता मन्दिर के
पास,शहीद कॉलोनी,ब्यावरा(राजगढ.)मप्र
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Wednesday, 25 February 2015

अजनार की यात्रा

अजनार का प्रारम्भ आंदलहेड़ा के तालाब से होता है जो आगर-आगरी,मलावर होते हुए एक छोटे नाले में बदलने लगती है.बूड़ाखेड़ा और अंगदपुर में पानी बड़ने
लगता है.बारवाँ,लसूड्ल्याऔर डाब्रया में
हरियाली और प्राकृतिक सुषमा में वृद्धि
होने लगती है.भूरा से बहादुरपुरा के बाद
एक छोटी नदी का रूप धर लेती है.यहाँ
नदी के दोनों किनारों पर हरी घास की
चादर सुन्दरता में वृद्धि करने लगती है
आसपास बड़े वृक्ष,पक्षियों का कलरव
और धूप की आँखमिचौली इसके सौन्दर्य
को अप्रतिम कर देते हैं.ब्यावरा में प्रवेश
के साथ ही अजनार एक नदी का रूप
लेती है.श्रीअंजनीलालधाम के पास तो
प्राकृतिक सुषमा देखते ही बनती है.प्राचीन
वृक्ष और सुन्दर घाट की सीड़ियाँ नदी को
गरिमा प्रदान करते हैं.द्वादशज्योतिर्लिंग के
पीछे नदी का उल्लास देखते ही बनता है.मानो नदी यहाँ जीवन्त हो उठती है.एक
कुण्ड में प्रवेश कर गौमुख से निःसृत हो
कर अजनार किल्लेवाले घाट पर पहुँच कर भगवान रामेश्वर का दर्शन कर तृप्त
हो जाती है.दोनों पुलों को पार कर छोटी
धाराओं मे बटकर मन्थर गति से एक मोड़
के बाद नदी रामलला के प्राचीन घाट पर
पहुँच जाती है.धीरे-धीरे फिर एक पुल पार
कर अन्तिम घाट पर बिछड़े हुए स्वजनों
के अवशेषों को अपने अंक में समेट कर
नदी ब्यावरा से विदा लेकर नयापुरा,पड्या
सुल्तानपुरा को पारकर  दांगीपुरा पहुँच
जाती है.अब राजस्थान के मनोहरधाना
में नेवज और घोड़ापछाड़ से महासंगम
कर यह बड़े नद में बदल जाती है.आस
पास के खेतों को सींचती अनगिनत जीवों
की प्यास बुझाती चलती है.तीन धारा में सात नदियों का संगम मरूप्रदेश की युगों
की प्यास बुझाती हुई सागर में लीन होने
की आकांक्षा से तेजी से दौड़ने लगती है.चम्बल नदी के रूप में राजस्थान के दक्षिण पूर्व में बहती हुई अन्त में उ.प्र.के जालौन जिले में यह यमुना नदी में संगम करती है.जो प्रयागराज में पवित्र गंगा में संगम कर गंगा बन जाती है.चम्बल के जल की विशेषता है इसकी निर्मलता.
बीच-बीच में छोटे-बड़े गाँव,शहर नदी को
मैली करने की होड़ करने लगते हैं.किन्तु
प्रकृति ने नदी को स्वयं स्वच्छ होने का
वरदान दिया है.यह है सेप्रोबियन सिस्टम
तीन किलो मीटर तक बहने से वायु,सूर्य,
मिट्टी,जीवजन्तु और सूक्ष्म जीवाणु इसे
फिर स्वच्छ कर देते हैं.हमें इस प्रवाह को
सतत बनाये रखना होगा.युगों से हमारे
पूर्वज नदियों से अमृततुल्य नीर और स्नेह
प्राप्त करते रहे हैं.इनके किनारों पर निवीढ़
शान्ति,पवित्रता और आनन्द प्राप्त करते
रहे हैं.देव अर्चन,पूजन,तर्पण औरआवाहन
कर आह्लाद प्राप्त करते रहे हैं.हमें भी
अपनी कृतज्ञता ज्ञापन करते हुए इन्हें स्वच्छ रखने और संरक्षण करना है.खुशी
की बात तो यह है कि आज ब्यावरा के सभी नागरिक,अंजनीलाल समीति,स्वयं
सेवी संस्थाएं,प्रशासन और संगठन इस
पवित्र कार्य में एकजुट होकर प्रयत्नशील
हैं.हम निश्चित ही आनेवाली पीड़ी को एक
सुन्दर और गरिमामय जल स्त्रोत सौंपकर
जाएंगे.
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श्रीगौरीशंकर नामदेव के सहयोग से
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एस.के.शर्मा,रिटा.प्राचार्य,२,माता मन्दिर के
पास,शहीद कालोनी ,ब्यावरा.
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अक्षपाद महर्षि गौतम

http://shrikrishnasharma.blogspot.in/2015/02/blog-post.html?m=1

Monday, 23 February 2015

अनुश्रवण-महर्षि गौतम

http://shrikrishnasharma.blogspot.in/2015/02/blog-post.html?m=1

अक्षपाद गौतमऋषि परम्पराकेब्राम्हण

राजस्थान के तीर्थराज पुष्कर में भगवान ब्रम्हा का प्रसिद्ध मन्दिर है.यह क्षैत्र मुख्य रूप से गुर्जर गौड़ ब्राम्हण समाज के लिये अत्यन्त पवित्र माना जाता है.प्राचीन गुर्जर प्रदेश में स्थित यह तीर्थ यहाँ के एक राजा गुर्जरकर्ण से सम्बन्ध रखता है.उनके लिये पुत्रेष्टि यज्ञ कराने वाले ऋषि अक्षपाद गौतम थे.इन्हीं गौतम ऋषि ने यज्ञ के द्वारा पुत्र की प्राप्ति राजा के कराई थी.
जमदग्नि भरद्वाजो विश्वामित्राणि गौतमः
वशिष्ट काश्यपायागत्या मुनयोगौत्र कारिणि (बौधायकल्प)
उक्त यज्ञ में १५६ शिष्य थे ८४यज्ञ करने बैठे तथा ७२ छोड़ (यज्ञ व्यवस्थामे)
गौतम ऋषि के शिष्य-वत्स,कौशिक,गौतम
शांडिल्य,भर्ग,मुद्गल,कश्यप,भारद्वाज,वशिष्टभृगु,पाराशर ये १२ थे.ऋषि गौतम की स्मृति में "गौतम तीर्थ" देवलिया जिला प्रतापगढ़ राजस्थान मेम स्थित है.राजा ने १५६ शिष्यों को १५६ ग्राम दिये,इन ग्रामों के नाम से कुलगौत्र 'आवंटक' हुए.गौड़ देश के ऋषि के कारण गौड़ और गुर्जर प्रान्त के होने से गुर्जर गौड़.(गौंडवाना के ब्राम्हण )इस प्रकार हम आमल्या ग्राम के जोशी थे अतः आमल्याजोशी कहलाये.
श्रीमद्भागवत के दशम स्कन्ध के ४५ वें
अध्याय का ३१  वाँ श्लोक(१०/४५/३१)
अथो गुरूकुले वासमिच्छन्तानुषजग्मतुः
काश्यपं सान्दीपनिं नाम ह्यवन्तीपुरवसिनम
भगवान श्रीकृष्ण,उज्जयिनी निवासी कश्यप गौत्रोत्पन्न सांदीपनि के आश्रम में
विद्या अध्ययन के लिये गये.
इस प्रकार हम कश्यप गौत्र के ब्राम्हण हैं.
हमारे पूर्वज लगभग ६०० वर्षपूर्व नरसिंह
गढ़ स्टेट के सारंगपुर के ग्राम नारायण्या
सुल्तान्या में आये थे.आज भी हमारे गौत्र
के लोग वहाँ रहते हैं.वहीं पर एक श्रुति के
अनुसार पूर्वज को खेती करते समय एक
सोने का पात्र मिला,जिसकी सूचना पर राजा ने उन्हें बुलाया.खेत के एक पत्थर को रखकर उन्होंने सकुशल लौटने पर भैरूँ मानकर पूजन की.वर्तमान में धाकड़
समाज ने दो चबूतरे बनाकर छोटेपर हमारे
भैरव की स्थापना की.जहाँ मैं सपरिवार
पूजन कर चुका हूँ.
********श्री गौतमाय नमः**********

Wednesday, 14 January 2015

बीते दिनों की बातें

सहैव मृत्यु्रव्रजति सह मृत्युर्निषीदति
गत्वा सुदीर्घमध्वानं सह मृत्युर्निवर्तते.
मृत्यु साथ ही चलती है,वह साथ ही बैठती है और सुदूरवर्ती पथ
पर भी साथ ही चल कर लौट आती है (हम सदैव उसके वश में रहते हैं).....बाल्मीक रामायण.
३१ जनवरी १९७१ कोई बहुत पुरानी तिथि नहीं लगती जब वरिष्ट सुह्रदों की साक्षी में उनके साथ एक पवित्र बन्धन में ,एक दृढ़ सूत्र में साथ रहने और एक साथ
रहने के वचन का विनिमय हुआ था.
एक दूसरे के साथ समन्वय रखते हुए ,
धीरे -धीरे किन्तु एक सशक्त शुरूवात हुई.
परिवार में वृद्धि होने से बन्धन मजबूत होने लगा.परस्पर सहयोग से गाड़ी आगे बड़ने लगी.मैं जीवन यात्रा में नितान्त अकेला और निःसहाय था.बेचारगी और
दीनता के मकड़जाल में उलझा हुआ.ऐसे
अवसर पर मुझे गहरा आत्मविश्वास और
समर्थन दिया.अब पीछे देखने का समय छूट चुका था.नई-नई परिस्थतियों और कठिनाइयों को उनके समर्थन से चुटकियों में उड़ाता चल रहा था.आर्थिक संकटों से पार पाते हुए ब्यावरा का मकान क्रय किया
और उसे पूर्णता दी.फिर तो आगे ही बड़ना
था.उतार चड़ाव आते रहे,मन्थर गति से कारवां बड़ता रहा.२००६से इनका स्वास्थ्य
गड़बड़ होने लगा था.पहिला मेजर आपरेशन .फिर ब्यावरा शिफ्ट होने का निश्च़य हुआ.किन्तु रोग पाँच वर्ष तक शमित होने के बाद फिर सर उठाने लगा.
आपरेशन के बाद वही कष्टप्रद इलाज .
सहनशक्ति सीमा पार करने लगी थी.
दवा और निदान ने आत्मबल पर हमला कर दिया था.१८ जनवरी २०१४ से रोग पर से नियन्त्रण हट गया था. अन्तिम वैला निकट आने लगी थी.उपचार अब रोग का
नहीं रह गया था अपितु कष्ट निवारण मात्र
था.सब कुछ समाप्त होरहा था.अब तो
ईश्वर का सहारा रह गया था. सभी पुत्र.पौत्र,सम्बन्धी एकत्र होने लगे थे लेकिन जाने वाले को कौन रोक सका है.
एक भरे पूरे परिवार को ,जिसके कण-कण को उन्होने सींचा था ,अपनी ममत्व भरी
सार सम्हार से आज निर्मोही के समान छोड़ चले थे.सारे स्नेह बन्धनों को निर्ममता से परे कर अपने मार्ग पर जाने वाले ए पथिक! तुमने अपना राह में काम आनेवाला परोपकार,पुण्य और सत्कर्मोॉ का पाथेय तो साथ में रख लिया ना ?
अब संसार की वास्तविकता सामने आगई है.कोई भी अपना साथी नहीं है.केवल
सत्कर्मों की यह पोटली ही काम आनी है.
है जीवनसाथी! सब कुछ छोड़कर यह कौनसा मार्ग पकड़ लिया है? इस अमरता के मार्ग पर सबको अकेला ही जाना होता है.
उड़ जायेगा रे हंस अकेला......
.........      ...........   ॐ ..........   .........
Shri Krishna sharma.अनुश्रवण.

Tuesday, 13 January 2015

यादों के उस पार

शिवना नदी मन्दसौर(म.प्र.) में बहने वाली एक मंझौले कद की नदी है जो बारिश में अपना वैभव दिखाती है,किन्तु गरमी में कंजूसी दिखाती है.सन्  १९७१में अपनी सेवा के सिलसिले में उधर जाना हुआ था
मन्दसौर का प्राचीन नाम दशपुर है जो उसके प्राचीनता की याद दिलाता है.रेल से रतलाम और फिर मन्दसौर.लेकिन जाना तो कहीं और था.मन्दसौर और उसके आसपास का क्षैत्र लम्बे समय से  अफीम उत्पादन करने वाला इलाका है,जो इसकी गहरी कालीमिट्टी की प्रचूर उत्पादन शक्ति के कारण है उस समय तक पक्की सड़कें नहीं बनी थी .वर्षा के कारण गहरी कीचड़
हो जाती है.कच्चे रास्तों पर चलना कठिन होता है.जाना था भाउगढ़ कीचड़ सूख जाने से रोज ही नया रास्ता बनता था.बस निकलने से रास्ते में ऊँचे निशान बन जाते जो सूखकर रास्ता खराब कर देते हैं
सन्ध्या को एक गाँव पहुँचे.बस की मंजिल यही थी किन्तु भाउगढ.अभी दूर था
रात्रि विश्राम और भोजन के बाद दूसरे दिन मंजिल पर पहुँचे.मित्रों के साथ रहना तय हुआ,सुबह स्नान करने के लिये शिवना नदी पर पहुँचे.नदी का उद् गम कुछ आगे  है.नदी से साक्षात्कार कुछ "अजनार" से मिलना था जो ब्यावरा की स्नेही नदी है.
लगभग एक माह रहना पड़ा लेकिन रोज एक घण्टा नदी के सानिध्य में रहने का आनन्द लिया.खूब खाना ,खूब पढ़ाना और सन्ध्या को बेडमिन्टन,चेस या बालीबॉल खेलना.मस्त दिनचर्या थी.भाउगढ़ था तो छोटा सा दैहात,किन्तु प्रचूर दूध होता था
इसीलिये वहाँ का "कलाकन्द" और खोआ
प्रसिद्ध था.जो मन्दसौर की यात्रा में दुकानों पर 'यहाँ भाउगढ़' का कलाकन्द मिलता है से ज्ञात हुआ.शिवना के पावन तट विशाल पशुपतिनाथ मन्दिर है.भारत का एकमात्र मन्दिर.भव्य ९फुट ऊँची विशाल मूर्ति.एक पुरूष के आलिंगन में नहीं आपाती.मन्दिर के पुजारी नागदा ब्राम्हण होते हैं,जिन्होनें प्रसिद्ध नागयज्ञ में भाग लिया धा.पास ही राजस्थान की सीमा पर प्रसिद्ध 'गौतमेश्वर'मन्दिर है जो लगभग २०० फुट गहरी गुफा में स्थित है.मालवा के प्रसिद्ध'लड्डूहाफले'के भोजन के साथ 'गुलकन्द'खाने का विधान है जो मिट्टी के बने कुल्हड़ में भांग से बना होता है.भोजन के बाद मन्दिर दर्शन.ऊपर गुफा में शिखर पर एक परिक्रमा लुड़क कर करने से गधे की योनि में जन्म नहीं होता.भगवान बुद्ध की छोटी प्रतिमा पेड़ के कोटर में कै़द है.एक शिलालेख के अनुसार जब आतताई औरंगजेब ने यहाँ आक्रमण किया तो मधुमक्खियों के हमले से पस्त होकर मन्दिर को दान दिया था
अचानक चक्करआने लगे.भांग का असर था और रंग जमाया था गधे की योनि से बचने की परिक्रमा ने.खूब हँसे और यात्रा का परमानन्द.....
..........   ..........   ॐ.   .....,.   ........
S.k.sharma...."अनुश्रवण"
़़ 31/D,s.f.s. flares,mayur vihar New Delhi.

Saturday, 10 January 2015

वसन्त के पाहुने

-
शिशिर के विदा होने का समय होता है तो कठोर शीत से सारा जीवन मानों राहत की साँस लेता हैlअपने घरोंदों से निकल कर जीव गरमाते वातावरण में पुनः विकास की साँस लेने लगता हैl खुशी,उत्साह और उमंग भरे वातावरण में मादकता भरने लगती है l "मधुमास" के स्वागत में प्रकृति के सारे घटक पौधे,जीव-जन्तु मादक वातावरण तैयार करने लगते हैlऋतुराज की अगवानी में सब अपना योगदान देते हैंlहम भी अपने अभाव,कष्ट,संघर्ष को भूलकर प्रकृति के सानिध्य में मुदित हो जाते हैंlऐसे ही वातावरण में वर्षों पूर्व मेरे बंजर में एक पुष्प का उदय हुआ थाlजो समस्त कष्ट,अभाव से पूर्ण जीवन में मोद,स्नेह और पूर्ण समर्पण कर मेरे जीवन को प्रगति और पूर्णता भर देने के लिये आया थाlगृहस्थी की गाड़ी हिचकोले लेते हुए परवान चढ़ने लगी lतिनका-तिनका जुड़कर सघन वृक्ष बनने की तैयारी होने लगी l अचानक एक प्रभंजन घुमड़ने लगा,और यह तो पतझड़ की तैयारी होने लगी lलम्बे साथ की आस धीरे-धीरे टूटने लगी lबच्चे बिलखने लगे सब कुछ बिखरने लगा lवसन्त की परवाह किये बगैर ही उन्होने हम से विलग होने की तैयारी कर ली थी lअथक परिश्रम,परिवार और पुत्रों के लिये पूर्ण समर्पण,कंधे से कंधा मिलाकर पूर्ण सहयोग सम्पूर्ण दायित्वों का मनोयोग से निर्वहन वह भी कई घातक और कष्टपूर्ण रोगों से संघर्ष करते हुए lकाश वे अपने जीवन के महत्वपूर्ण दिन की तो प्रतिक्षा कर लेतीं lमहापथ पर रवाना होने वाले यात्री कब अपने पाथेय की परवाह करते हैं lसबको बिलखता छोड़कर बस निकल जाते हैं..... आई गवनवा की बारी
उमर अबहीं मोरी बारी,
साज समाज पिया लैआए,
अउर कहरवा  चारी l
बभना बेदरदी दरदियो न जाने
जोड़त गाँठ हमारी
उमर अबहिं मोरी बारी
टूटल गाँव नगर से नाता
छूटल महल अटारी,
विधि गति वाम कछु समझि परे ना,
बैरन भई महतारी,
नदिया किनारे बलम मोर रसिया,
दी घूंघट पट डारी,
चार जना मिलि डोली उठावै
घरवा से देत निकारी,
कहत कबीर सुनो भई साधो,
छमियो चूक हमारी,
अबकी गवना बहुरि नहिं अवना,
मिलिलेहु भेंट अँकवारी
आई गवनवा की बारी.....
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श्रीमती जयमंगला शर्मा M.A.B.Ed.
(1.3.1953-30.1.2014)
*********************************
.........  .........  ॐ..........   .......  ........

.वरिष्ठ  शिक्षक शा. कन्या उ. मा.विद्यालय       ब्यावरा (राजगढ़ ) म. प्र .  

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  वासांसि जीर्णानि यथा विहाय

   नवानि गृह्लाति   नरोपराणि

   तथा शरीराणि  जीर्णान्यन्यानि

    संयाति     नवानि       देहि.

    "जैसे कोई  व्यक्ति  फटे-पुराने कपड़ों  को

     उतार देता है और दूसरे  नये कपड़े पहन

     लेता  है  उसी  प्रकार यह धारण  करने .

     वाली  आत्मा जीर्ण -शीर्ण शरीर  का त्याग

     अन्य नये  शरीर. को  धारण कर लेती है.

    जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं   मृतस्य.  च

    तस्मादपरिहार्येS र्थे न त्वं शोचितुमर्हसि

 जो जन्म लेता है उसकी मृत्यु निश्चित है .

 इसलिये जिससे बचा ही नहीं जा सकता

 उसके लिये तुझे शोक नहीं करना चाहिए  "

    "इस अस्तित्व के घूमते हुए संसार में कौन

मरा हुआ व्यक्ति पुनः जन्म नहीं लेता" सुकरात

   ...........ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः..........

Friday, 9 January 2015

क्षण भंगुर जीवन

मनुष्य जब से जीवन ग्रहण करता है,इस संसार से अपना नाता जोड़ लेता है.मेरी माता,मेरे पिता,सम्बन्धी,घर,समाज आदि. जैसे सम्बन्ध प्रगाढ़ होते जाते हैं उसकी आसक्ति बड़ने लगती है.अपने पराये का बोध होने से स्नेह,घृणा,प्रसन्नता,और अन्य मानवीय भावनाएं धीरे -धीरे उसे सांसारिक बन्धनों में जकड़ने लगती हैं.क्रमशः विकास होने से उसे वास्तविकता का बोध होने लगता है.स्वार्थ पूर्ति न होने पर दुःख तथा न होने पर क्लेश की अनुभूति होती है.कठोर सांसारिक परिस्थतियां उसे कभी-कभी इतनी सताती है कि वह निराश होकर सम्बन्धों और समाज से अलग होकर चिन्तन में डूब कर साहित्य इतिहास,और अध्यात्म से प्रेरणा पाकर सतत जीवन से परे जाकर कोई नई राह पकड़ लेता है.उसे संसार के सारे रिश्ते नाते,ममता और सामाजिक सरोकार भी बन्धन के रूप में लगने लगते हैं.उसकी आत्मा उसे कचोटने लगती है.वह काल्पनिक संसार में रहता हुआ जीवन की कठोर सचाई से मुंह मोड़ने लगता है. इसी सम़य वह एक ऐसे मार्गदर्शक की खोज में लग जाता है जो उसे सही राह पर चलने की प्रेरणा दे सके .वह उनकी सहायता से जीवन की क्षण भंगुरता की सचाई को जान लेता है और वर्तमान सम्बन्ध,योग्य कर्तव्य से पूर्ण करता हुआ आगे बड़ने लगता है.कबीर दास जी ने बड़े ही सुन्दर तरीके से मानव को सावधान किया है.
एक दिन जाना होगा जरूर.
लछिमन राम अगर जो होते,होते हाल हजुर.
कुम्भकरन रावन बड़ जोधा,कहत हते हम सूर.
अर्जुन सा छत्री नहिं जग में करन दान भरपूर.
भीम युधिष्ठिर पांचों पांडों,मिल यम माटी धूर.
धरती पवन अकासो जइहैं,जइहैं चन्दा सूर.
कहत कबीर भजन कब करिहो,ठाडा़ काल हजूर.
एक दिन जाना होगा जरूर.
और व्यक्ति उस सच्चिदानन्द परमात्मा की ओर उन्मुख होकर पूर्णता प्राप्ति के लिये निकल पड़ता है.
      .........   .......... ॐ......... .........
S.k.sharma.....,"अनुश्रवण"...........
31 D/s.f.s.flates,mayur vihar,New Delhi.