Thursday, 26 February 2015

प्राचीन भारतीयों का भूगोल

माना जाता है कि भारतीय विन्ध्य पर्वत के दक्षिण दिशा के भूगोल से परिचित नहीं थे.
श्रीमद् भागवत के इस श्लोक को देखिये.
"चन्द्रवसा ताम्रपर्णी अवरिदा कृतमाला
वैहावसी,कावेरी,वेषी,पयस्विनि,शर्करावती
तुंगभद्रा,कृष्णा,वैण्या,भीरूरथी,गोदावरी
निर्विंध्या,पयोष्वी,तापी,रेवा,सुरसा,नर्मदा
चर्मण्यवती,सिन्धुरन्ध्रःशोणश्च नदौ,महानदी
वेदस्मृति,ऋषितुल्या,त्रिसमिधा,कौशिकी
मन्दाकिनी,यमुना,सरस्वती,द्रष्द्वती,गौतमी
सरयू,रोधस्वी,सप्तवती,सुषोणा,शत्चन्द्र-भागा,मरूधा,वितस्ताअसिद्री,विश्वेति महानद्यः (श्रीमद् भागवत ५/१९/१८)
लगभग ४४नदियों की सूची है जिसमें उत्तर दक्षिण की नदियाँ शामिल है.
भगवान कृष्ण के भाई बलदेवजी की तीर्थ
यात्रा के वर्णन में सारे भूगोल का वर्णन है
आर्या द्वैपायनी दृष्ट्वा शूर्णरकमानाद बलः
तापीं पयोष्णी निर्विन्ध्यामुखपस्पृष्यात्म
दण्डकम (श्रीमद् भागवत १०/७९/२०)
पुराणों में भारत भूमि के सभी पर्वतों,नदी,तालाब,ग्राम,नगर और भौगोलिक रचनाओं का नामकरण और
विशद भौगोलिक वर्णन मिलता है.
हमारे राजगढ़ जिले की निर्विन्ध़्या(नेवज)
का वर्णन दृष्टव्य है.श्रीमद् भागवत में नेवज
नदी का वर्णन कई बार आया है.बताते हैं कि नेवज के किनारे पर महर्षि अत्रि का आश्रम गुरूकुल विद्यमान था.
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एस.के.शर्मा,रिटा.प्राचार्य,२,माता मन्दिर के
पास,शहीद कॉलोनी,ब्यावरा(राजगढ.)मप्र
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