Wednesday, 25 February 2015

अजनार की यात्रा

अजनार का प्रारम्भ आंदलहेड़ा के तालाब से होता है जो आगर-आगरी,मलावर होते हुए एक छोटे नाले में बदलने लगती है.बूड़ाखेड़ा और अंगदपुर में पानी बड़ने
लगता है.बारवाँ,लसूड्ल्याऔर डाब्रया में
हरियाली और प्राकृतिक सुषमा में वृद्धि
होने लगती है.भूरा से बहादुरपुरा के बाद
एक छोटी नदी का रूप धर लेती है.यहाँ
नदी के दोनों किनारों पर हरी घास की
चादर सुन्दरता में वृद्धि करने लगती है
आसपास बड़े वृक्ष,पक्षियों का कलरव
और धूप की आँखमिचौली इसके सौन्दर्य
को अप्रतिम कर देते हैं.ब्यावरा में प्रवेश
के साथ ही अजनार एक नदी का रूप
लेती है.श्रीअंजनीलालधाम के पास तो
प्राकृतिक सुषमा देखते ही बनती है.प्राचीन
वृक्ष और सुन्दर घाट की सीड़ियाँ नदी को
गरिमा प्रदान करते हैं.द्वादशज्योतिर्लिंग के
पीछे नदी का उल्लास देखते ही बनता है.मानो नदी यहाँ जीवन्त हो उठती है.एक
कुण्ड में प्रवेश कर गौमुख से निःसृत हो
कर अजनार किल्लेवाले घाट पर पहुँच कर भगवान रामेश्वर का दर्शन कर तृप्त
हो जाती है.दोनों पुलों को पार कर छोटी
धाराओं मे बटकर मन्थर गति से एक मोड़
के बाद नदी रामलला के प्राचीन घाट पर
पहुँच जाती है.धीरे-धीरे फिर एक पुल पार
कर अन्तिम घाट पर बिछड़े हुए स्वजनों
के अवशेषों को अपने अंक में समेट कर
नदी ब्यावरा से विदा लेकर नयापुरा,पड्या
सुल्तानपुरा को पारकर  दांगीपुरा पहुँच
जाती है.अब राजस्थान के मनोहरधाना
में नेवज और घोड़ापछाड़ से महासंगम
कर यह बड़े नद में बदल जाती है.आस
पास के खेतों को सींचती अनगिनत जीवों
की प्यास बुझाती चलती है.तीन धारा में सात नदियों का संगम मरूप्रदेश की युगों
की प्यास बुझाती हुई सागर में लीन होने
की आकांक्षा से तेजी से दौड़ने लगती है.चम्बल नदी के रूप में राजस्थान के दक्षिण पूर्व में बहती हुई अन्त में उ.प्र.के जालौन जिले में यह यमुना नदी में संगम करती है.जो प्रयागराज में पवित्र गंगा में संगम कर गंगा बन जाती है.चम्बल के जल की विशेषता है इसकी निर्मलता.
बीच-बीच में छोटे-बड़े गाँव,शहर नदी को
मैली करने की होड़ करने लगते हैं.किन्तु
प्रकृति ने नदी को स्वयं स्वच्छ होने का
वरदान दिया है.यह है सेप्रोबियन सिस्टम
तीन किलो मीटर तक बहने से वायु,सूर्य,
मिट्टी,जीवजन्तु और सूक्ष्म जीवाणु इसे
फिर स्वच्छ कर देते हैं.हमें इस प्रवाह को
सतत बनाये रखना होगा.युगों से हमारे
पूर्वज नदियों से अमृततुल्य नीर और स्नेह
प्राप्त करते रहे हैं.इनके किनारों पर निवीढ़
शान्ति,पवित्रता और आनन्द प्राप्त करते
रहे हैं.देव अर्चन,पूजन,तर्पण औरआवाहन
कर आह्लाद प्राप्त करते रहे हैं.हमें भी
अपनी कृतज्ञता ज्ञापन करते हुए इन्हें स्वच्छ रखने और संरक्षण करना है.खुशी
की बात तो यह है कि आज ब्यावरा के सभी नागरिक,अंजनीलाल समीति,स्वयं
सेवी संस्थाएं,प्रशासन और संगठन इस
पवित्र कार्य में एकजुट होकर प्रयत्नशील
हैं.हम निश्चित ही आनेवाली पीड़ी को एक
सुन्दर और गरिमामय जल स्त्रोत सौंपकर
जाएंगे.
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श्रीगौरीशंकर नामदेव के सहयोग से
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एस.के.शर्मा,रिटा.प्राचार्य,२,माता मन्दिर के
पास,शहीद कालोनी ,ब्यावरा.
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1 comment:

  1. बहुत सुंदर और जीवंत चित्रण।

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