मनुष्य जब से जीवन ग्रहण करता है,इस संसार से अपना नाता जोड़ लेता है.मेरी माता,मेरे पिता,सम्बन्धी,घर,समाज आदि. जैसे सम्बन्ध प्रगाढ़ होते जाते हैं उसकी आसक्ति बड़ने लगती है.अपने पराये का बोध होने से स्नेह,घृणा,प्रसन्नता,और अन्य मानवीय भावनाएं धीरे -धीरे उसे सांसारिक बन्धनों में जकड़ने लगती हैं.क्रमशः विकास होने से उसे वास्तविकता का बोध होने लगता है.स्वार्थ पूर्ति न होने पर दुःख तथा न होने पर क्लेश की अनुभूति होती है.कठोर सांसारिक परिस्थतियां उसे कभी-कभी इतनी सताती है कि वह निराश होकर सम्बन्धों और समाज से अलग होकर चिन्तन में डूब कर साहित्य इतिहास,और अध्यात्म से प्रेरणा पाकर सतत जीवन से परे जाकर कोई नई राह पकड़ लेता है.उसे संसार के सारे रिश्ते नाते,ममता और सामाजिक सरोकार भी बन्धन के रूप में लगने लगते हैं.उसकी आत्मा उसे कचोटने लगती है.वह काल्पनिक संसार में रहता हुआ जीवन की कठोर सचाई से मुंह मोड़ने लगता है. इसी सम़य वह एक ऐसे मार्गदर्शक की खोज में लग जाता है जो उसे सही राह पर चलने की प्रेरणा दे सके .वह उनकी सहायता से जीवन की क्षण भंगुरता की सचाई को जान लेता है और वर्तमान सम्बन्ध,योग्य कर्तव्य से पूर्ण करता हुआ आगे बड़ने लगता है.कबीर दास जी ने बड़े ही सुन्दर तरीके से मानव को सावधान किया है.
एक दिन जाना होगा जरूर.
लछिमन राम अगर जो होते,होते हाल हजुर.
कुम्भकरन रावन बड़ जोधा,कहत हते हम सूर.
अर्जुन सा छत्री नहिं जग में करन दान भरपूर.
भीम युधिष्ठिर पांचों पांडों,मिल यम माटी धूर.
धरती पवन अकासो जइहैं,जइहैं चन्दा सूर.
कहत कबीर भजन कब करिहो,ठाडा़ काल हजूर.
एक दिन जाना होगा जरूर.
और व्यक्ति उस सच्चिदानन्द परमात्मा की ओर उन्मुख होकर पूर्णता प्राप्ति के लिये निकल पड़ता है.
......... .......... ॐ......... .........
S.k.sharma.....,"अनुश्रवण"...........
31 D/s.f.s.flates,mayur vihar,New Delhi.
Friday, 9 January 2015
क्षण भंगुर जीवन
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