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शिशिर के विदा होने का समय होता है तो कठोर शीत से सारा जीवन मानों राहत की साँस लेता हैlअपने घरोंदों से निकल कर जीव गरमाते वातावरण में पुनः विकास की साँस लेने लगता हैl खुशी,उत्साह और उमंग भरे वातावरण में मादकता भरने लगती है l "मधुमास" के स्वागत में प्रकृति के सारे घटक पौधे,जीव-जन्तु मादक वातावरण तैयार करने लगते हैlऋतुराज की अगवानी में सब अपना योगदान देते हैंlहम भी अपने अभाव,कष्ट,संघर्ष को भूलकर प्रकृति के सानिध्य में मुदित हो जाते हैंlऐसे ही वातावरण में वर्षों पूर्व मेरे बंजर में एक पुष्प का उदय हुआ थाlजो समस्त कष्ट,अभाव से पूर्ण जीवन में मोद,स्नेह और पूर्ण समर्पण कर मेरे जीवन को प्रगति और पूर्णता भर देने के लिये आया थाlगृहस्थी की गाड़ी हिचकोले लेते हुए परवान चढ़ने लगी lतिनका-तिनका जुड़कर सघन वृक्ष बनने की तैयारी होने लगी l अचानक एक प्रभंजन घुमड़ने लगा,और यह तो पतझड़ की तैयारी होने लगी lलम्बे साथ की आस धीरे-धीरे टूटने लगी lबच्चे बिलखने लगे सब कुछ बिखरने लगा lवसन्त की परवाह किये बगैर ही उन्होने हम से विलग होने की तैयारी कर ली थी lअथक परिश्रम,परिवार और पुत्रों के लिये पूर्ण समर्पण,कंधे से कंधा मिलाकर पूर्ण सहयोग सम्पूर्ण दायित्वों का मनोयोग से निर्वहन वह भी कई घातक और कष्टपूर्ण रोगों से संघर्ष करते हुए lकाश वे अपने जीवन के महत्वपूर्ण दिन की तो प्रतिक्षा कर लेतीं lमहापथ पर रवाना होने वाले यात्री कब अपने पाथेय की परवाह करते हैं lसबको बिलखता छोड़कर बस निकल जाते हैं..... आई गवनवा की बारी
उमर अबहीं मोरी बारी,
साज समाज पिया लैआए,
अउर कहरवा चारी l
बभना बेदरदी दरदियो न जाने
जोड़त गाँठ हमारी
उमर अबहिं मोरी बारी
टूटल गाँव नगर से नाता
छूटल महल अटारी,
विधि गति वाम कछु समझि परे ना,
बैरन भई महतारी,
नदिया किनारे बलम मोर रसिया,
दी घूंघट पट डारी,
चार जना मिलि डोली उठावै
घरवा से देत निकारी,
कहत कबीर सुनो भई साधो,
छमियो चूक हमारी,
अबकी गवना बहुरि नहिं अवना,
मिलिलेहु भेंट अँकवारी
आई गवनवा की बारी.....
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श्रीमती जयमंगला शर्मा M.A.B.Ed.
(1.3.1953-30.1.2014)
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......... ......... ॐ.......... ....... ........
.वरिष्ठ शिक्षक शा. कन्या उ. मा.विद्यालय ब्यावरा (राजगढ़ ) म. प्र .
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वासांसि जीर्णानि यथा विहाय
नवानि गृह्लाति नरोपराणि
तथा शरीराणि जीर्णान्यन्यानि
संयाति नवानि देहि.
"जैसे कोई व्यक्ति फटे-पुराने कपड़ों को
उतार देता है और दूसरे नये कपड़े पहन
लेता है उसी प्रकार यह धारण करने .
वाली आत्मा जीर्ण -शीर्ण शरीर का त्याग
अन्य नये शरीर. को धारण कर लेती है.
जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं मृतस्य. च
तस्मादपरिहार्येS र्थे न त्वं शोचितुमर्हसि
जो जन्म लेता है उसकी मृत्यु निश्चित है .
इसलिये जिससे बचा ही नहीं जा सकता
उसके लिये तुझे शोक नहीं करना चाहिए "
"इस अस्तित्व के घूमते हुए संसार में कौन
मरा हुआ व्यक्ति पुनः जन्म नहीं लेता" सुकरात
...........ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः..........
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