Wednesday, 14 January 2015

बीते दिनों की बातें

सहैव मृत्यु्रव्रजति सह मृत्युर्निषीदति
गत्वा सुदीर्घमध्वानं सह मृत्युर्निवर्तते.
मृत्यु साथ ही चलती है,वह साथ ही बैठती है और सुदूरवर्ती पथ
पर भी साथ ही चल कर लौट आती है (हम सदैव उसके वश में रहते हैं).....बाल्मीक रामायण.
३१ जनवरी १९७१ कोई बहुत पुरानी तिथि नहीं लगती जब वरिष्ट सुह्रदों की साक्षी में उनके साथ एक पवित्र बन्धन में ,एक दृढ़ सूत्र में साथ रहने और एक साथ
रहने के वचन का विनिमय हुआ था.
एक दूसरे के साथ समन्वय रखते हुए ,
धीरे -धीरे किन्तु एक सशक्त शुरूवात हुई.
परिवार में वृद्धि होने से बन्धन मजबूत होने लगा.परस्पर सहयोग से गाड़ी आगे बड़ने लगी.मैं जीवन यात्रा में नितान्त अकेला और निःसहाय था.बेचारगी और
दीनता के मकड़जाल में उलझा हुआ.ऐसे
अवसर पर मुझे गहरा आत्मविश्वास और
समर्थन दिया.अब पीछे देखने का समय छूट चुका था.नई-नई परिस्थतियों और कठिनाइयों को उनके समर्थन से चुटकियों में उड़ाता चल रहा था.आर्थिक संकटों से पार पाते हुए ब्यावरा का मकान क्रय किया
और उसे पूर्णता दी.फिर तो आगे ही बड़ना
था.उतार चड़ाव आते रहे,मन्थर गति से कारवां बड़ता रहा.२००६से इनका स्वास्थ्य
गड़बड़ होने लगा था.पहिला मेजर आपरेशन .फिर ब्यावरा शिफ्ट होने का निश्च़य हुआ.किन्तु रोग पाँच वर्ष तक शमित होने के बाद फिर सर उठाने लगा.
आपरेशन के बाद वही कष्टप्रद इलाज .
सहनशक्ति सीमा पार करने लगी थी.
दवा और निदान ने आत्मबल पर हमला कर दिया था.१८ जनवरी २०१४ से रोग पर से नियन्त्रण हट गया था. अन्तिम वैला निकट आने लगी थी.उपचार अब रोग का
नहीं रह गया था अपितु कष्ट निवारण मात्र
था.सब कुछ समाप्त होरहा था.अब तो
ईश्वर का सहारा रह गया था. सभी पुत्र.पौत्र,सम्बन्धी एकत्र होने लगे थे लेकिन जाने वाले को कौन रोक सका है.
एक भरे पूरे परिवार को ,जिसके कण-कण को उन्होने सींचा था ,अपनी ममत्व भरी
सार सम्हार से आज निर्मोही के समान छोड़ चले थे.सारे स्नेह बन्धनों को निर्ममता से परे कर अपने मार्ग पर जाने वाले ए पथिक! तुमने अपना राह में काम आनेवाला परोपकार,पुण्य और सत्कर्मोॉ का पाथेय तो साथ में रख लिया ना ?
अब संसार की वास्तविकता सामने आगई है.कोई भी अपना साथी नहीं है.केवल
सत्कर्मों की यह पोटली ही काम आनी है.
है जीवनसाथी! सब कुछ छोड़कर यह कौनसा मार्ग पकड़ लिया है? इस अमरता के मार्ग पर सबको अकेला ही जाना होता है.
उड़ जायेगा रे हंस अकेला......
.........      ...........   ॐ ..........   .........
Shri Krishna sharma.अनुश्रवण.

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